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क्या किसान आंदोलन की आड़ में हो रही है किसानो की छवि बिगाड़ने की कोशिश ?

 

किसान आंदोलन अपने चरम पर है। पांच बार भाई सरकार से वार्ता के बावजूद किसानो की मांगो को लेकर अभी तक कोई निष्कर्ष नहीं निकल पाया है। किसान अपनी मांगो को लेकर झुकने को तैयार नहीं है जिसके चलते कल 8 दिसम्बर को किसानो ने भारत बंद का एलान किया है। किसान आंदोलन जैसे जैसे बढ़ता जा रहा है वैसे ही मन में कुछ संशय भी अब पैदा होने लगे है। किसान आंदोलन जब शुरू हुआ तो उसमे शामिल होने वाले निश्चित तौर पर किसान ही थे लेकिन अब बहुत सी राजनितिक पार्टियों के प्रतिनिधि भी उससे जुड़ने लगे है ताकि वो लोग भी इसकी आड़ में अपनी राजनीति की दूकान अच्छे से चमका सके। कुछ सस्ती TRP के चक्कर में फर्जी समाजसेवी भी आपको यहां फोटो लेते हुए दिख जाएंगे।


हजारो किसान टिकरी बॉर्डर और सिंधु पर अपनी मांगो को लेकर अड़े हुए है। अब इतनी बड़ी भीड़ को देखकर राजनीतिक भेड़िये तो आएंगे ही क्योंकि उन के लिए तो यह किसी मौके से कम नहीं है क्योंकि जो भीड़ वो अपनी रैलियों में पैसे खर्च करके भी नहीं जुटा पाते वो उनको बैठे बिठाये मिल गई। जो आंदोलन किसानो की मांगो से शुरू हुआ था वो अब पूर्ण रूप से राजनितिक रंग से रंगा हुआ प्रतीत होता है। 


बात यही खत्म हो जाती तो भी सही था क्योंकि राजनीति तो कही न कही हर वर्ग पर हावी रहती है और विपक्ष कोई भी सरकार के साथ हो ही नहीं सकता। मै किसानो की मांगो या कृषि कानून को सही या गलत नहीं बता रहा हु वो तो किसानो और सरकार दोनों को अपना अपना पक्ष ज्यादा बेहतर पता है। खैर चिंता की बात यह है कि किसान आंदोलन अब देश का मुद्दा न रह कर अंतर्राष्ट्रीय मुद्दा बन गया है और इसमें शामिल होकर कई विदेशी ताकत हमारे देश को कमजोर करना चाहती है। 


अभी हाल ही में ब्रिटेन में स्थित भारतीय दूतावास के सामने प्रदर्शन किया गया और उसमे खालिस्तान के झंडे लहराए गए। ऐसी ही खबरे और जगहों से भी आई। एक बार फिर से भारत को तोड़ने और खालिस्तान की स्थापना की आवाजे उठने लगी है। आज सुबह भी दिल्ली पुलिस ने 5 आंतकी गिरफ्तार किये जिनका सबंध खालिस्तान से है। अब किसान आंदोलन सच में डरा रहा है कही कुछ देशद्रोही ताकते हमारे भोले किसानो को ढाल बना कर देश का माहौल और इन भूमिपुत्रो की छवि हमेशा के लिए ना बिगाड़ दे।

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