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जानिये क्या होती है “ओरण भूमि” : क्या आपके गाँव में भी है ऐसी भूमि ?

 

प्राचीन काल से ही राजपूताना में राजे महाराजे रजवाड़े सेठ साहूकार जमींदार जागीरदार एवं भामाशाह जब लोक देवी देवताओं अथवा ग्राम/स्थानीय देवी देवताओं के मंदिरों का निर्माण करवाते थे तो मन्दिर के आसपास की सैंकड़ो बीघा भूमि ओरण के नाम कर देते थे ….

मन्ने देवी देवताओं मन्दिर के नाम (ओरण भूमि) ….

इस भूमि का मालिकाना हक एक प्रकार से प्रत्यक्ष अप्रत्यक्ष रूप से मन्दिर एवं मन्दिर के पुजारी के नाम होता था …. उस वक़्त भूमियों के पट्टे जारी नहीं होते थे जो राजाओं महाराजाओं जागीरदारों कोठारियों भण्डारियों ने कह दिया वो ही राजाज्ञा या पट्टा होता था …. राजस्थान में जमीनों के पट्टे रियासतों दरबारों से विगत 400-500 वर्षों से जारी होना शुरू हुए हैं ….

ओरण भूमि का उपयोग ब्राह्मण शुद्र गौ एवं कन्याओं के कल्याण अथवा उत्थान के लिए होता था ….

क्षत्रिय एवं वैश्य वर्ण को ओरण भूमि में हस्तक्षेप या उस भूमि के उपभोग एवं अतिक्रमण का अधिकार दरबारों द्वारा प्रदत्त नहीं किया जाता था ….

चौमासे में ओरण भूमि में घास उगे तो इलाके की गौ-मातायें भेड़ ऊंट बकरियां पशु ओरण भूमि में चर सकते थे …. पक्षियों के लिए दाना ओरण भूमि में डाला जाता था …. गरीब ब्राह्मण पुजारी भोपे शुद्र ओरण भूमि से लकड़ियां काट के चूल्हे का ईंधन ले सकते थे …. गरीब ब्राह्मण शुद्र ओरण भूमि में थोड़ा बहुत अन्न सब्जियां उगा सकते थे …. क्षेत्र की बहन बेटियां खेलने कूदने एवं सावन के झूलों और तीज त्योहारों में ओरण भूमि का उपयोग कर सकती थी ….

ओरण भूमि की उपज एवं आय को दरबारों द्वारा सरकारी रिकॉर्ड में राजस्व एवं लगान से मुक्त रखा जाता था ….
यह हमारी सामाजिक व्यवस्था थी ….

15 अगस्त 1947 को देश आजाद हुआ ….

1956 तक राजपूताना की सम्पूर्ण रियासतों का विलय भारत जनसंघ में सम्पन्न हुआ और नए राजस्थान का निर्माण हुआ ….
रियासतों की भूमियों का विलय भारत जनसंघ में हुआ ….

प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने नए भू सुधार कानून लागू किये और चकबंदी और जोतों में कृषि भूमि के पट्टे उस भूमि पर जुताई करने वालों के नाम जारी कर दिए …. (चकबंदी में हमारी भी काफी जमीनें दूसरों के नाम दर्ज हो के चली गयी) ….
लेकिन ….

ओरण भूमि की व्यवस्था या पट्टे इंदिरा जी के भू सुधार कार्यक्रम में शामिल नहीं थे ….
राजस्थान में लाखों बीघा भूमि ओरण भूमि है मन्ने मन्दिरो के आसपास की देवभूमि ….
धीरे-धीरे ओरण की जमीनों पर भू माफियाओं और इलाके के प्रभावशाली लोगों नेताओं सरकारी कर्मचारियों अधिकारियों का कब्जा होना शुरू हुआ ….
ओरण भूमि में प्लॉट कटने लगे …. अब तो ओरण भूमि में विशाल कॉलोनियां मोहल्ले बन चुके है पूरे राजस्थान में ….
हमारे यहां भी ओरण भूमियाँ खुर्दबुर्द हो चुकी है ….
जिन राजे रजवाड़ों सेठों साहूकारों जमींदारों जागीरदारों भामाशाहों ने जो भूमियाँ समाज कल्याण एवं कन्या ब्राह्मण शुद्र गौ कल्याण के लिए दी थी वो सब अब अवैध कब्जे से युक्त हो चुकी ….

राजस्थान की लाखों बीघा ओरण भूमियों के हजारों केस मुकदमे राजस्थान की निचली अदालतों से ले के जयपुर जोधपुर हाई-कोर्ट तक लंबित पड़े हैं दशकों से ….
इन मुकदमों का फैसला इतना जल्दी आसानी से आना भी नहीं और सरकारों के संरक्षण से हुआ ये अतिक्रमण भी अब मुक्त होना नहीं है ….

जिन राजाओं महाराजाओं रजवाड़ों सेठों साहूकारों जमींदारों जागीरदारों ने एवं उनके पूर्वजों ने जो भूमि समाज ब्राह्मण शुद्र कन्या गौ कल्याण के लिए छोड़ी थी

ओरण का मतलब होता है देव-भूमि अथवा मन्दिर के आसपास की भूमि 

आज इंटरनेट है और मीडिया सोशल-मीडिया है तो सपोटरा वाली घटना का देश दुनियां को मालूम चला है ….
वरना ….

आजतक ना मालूम कितनी हत्यायों के राज जमींदोज हो चुके है ….
मैं खुद अनेकानेक घटनाओं का साक्षी हूँ!! …

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