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विवाहों में गहने खरीदने और और तनिष्क का उसकी आड़ में परम्पराओ का शोषण करना कितना सही है !

 

हमारे यहाँ विवाह संबंधों की बात होती है तो सबसे पहले स्त्रीधन या गहनों की बात होती है| मंडप पर नववधू को कितने गहने चढ़ेंगे यह मंडप की शोभा होती है| श्वसुर जी यह स्त्रीधन सम्पूर्ण कुटुंब के सामने नववधू को आशीर्वाद स्वरूप देते हैं| फिर भैंसुर यानि जेठ घूंघट डालते हुए गहने देता है| उसके बाद परिवार के सभी बड़े वधु को मुँहदिखाई में गहने देते हैं|

निर्धन से निर्धन परिवार भी विवाह के समय नए जोड़ों को सामर्थ्य से ज्यादा ही आभूषण जुटा देता है| फिर सामर्थ्यवान परिवार जो आजकल तीन दिन के ब्याह-समारोह के लिए एक अदद इवेंट मैनेजर और फोटोग्राफर को लाखों पे करते हैं उनके बजट में भी गहनों का स्थान सबसे ऊपर रहता है|

पारम्परिक विरासत में मिले गहने हों या सासु माँ के कँगन| दादी सास की मटरमाला हो नानी सास के अंगूठे| बहु ये मेरी सास ने मुझे पहनाया था से लेकर हीरा है सदा के लिए| शगुन की मछली, पान-सुपारी, विवाह प्रतीक के रूप में माँगटीका हो , नथ हो, ढोलना हो, पटवासी हो या कि प्रथम मिलन की रात्रि का उपहार!

फिर जीवन भर तीज, जितिया, करवाचौथ, धनतेरस पर गहने| सोने का जितिया, बिछुआ, पायल, मंगलसूत्र, सिक्के, सोने-चाँदी की देव प्रतिमाएं, लक्ष्मी-गणेश, सिंहासन| गहने ही गहने!

लड़कियाँ तो कई बार यह भी सोच कर रोमांचित हो जाती है कि विवाह में इतने गहने-कपड़े मिलेंगे|

मारवाड़ियों और दक्षिण भारतीयों के किलो-किलो गहनों के चित्र किसने नहीं देख रखे हैं|

EMI पर गृहस्थी बसाने वाली आज की पीढ़ी के लिए सभी नए ज्वेलरी ब्रांडों को भी किस्तों पर गहने बेचने का बड़ा बाजार दिख पड़ा| तनिष्क के अनुत्तरा कार्ड और गोल्डन हार्वेस्ट स्कीम की सफलता और क्या बताती है? हजार दो हजार क्या यहाँ तक कि पाँच-पाँच सौ की छोटी बचत को परिवार के सौभाग्य एवं सम्पत्ति से कैसे जोड़ा जाता है यह हमें! हमें बाबूजी हमें! ( खिचड़ी स्टाइल) कोई और सिखाएगा?

किसी आपातकाल में परिवार तो क्या देश के लिए भी गहने निकालने में स्त्रियाँ अग्रगण्य होती हैं|

तिसपर वे लोग दक्षिणपंथियों के गहने खरीदने की औकात पर तंज करते हैं जिनके पास स्वयं विवाह नाम की संस्था नहीं बल्कि चरस का बड़का खर्चा हो| जिनका Niकाह नापायेदार हो, जिन्हें हमारे थॉट प्रोसेस से ही समस्या हो वे हमारे ही हथियार पर सेंध लगाने का प्रयास कर रहे| ई ना चोलबे!

लिव इन में गहना कहाँ से आएगा? जहाँ गृहस्थी नहीं वहाँ गहने कहाँ?

हिंदू बहु की बात करते हैं!

कश्मीर से हिंदू ख़त्म हो गए, जो बचे उनकी बेटियों की गोद भराई में तनिष्क के या किस ब्रांड के या मोहल्ले के सुनारों से लेकर कितने गहने दिए गए? कोई बताएगा!

और बहु मुस्लिम होती तो क्या बुरा होता?

अफ़रोज़ के लिए निर्भया स्वावलम्बन योजना चलाने वाले उदारवादी बताएँगे हमें कि और कितनी सहिष्णुता चाहिए!

पर हाय रे किस्मत! आपके मुँह पर तमाचा! हम तो बस पूछ रहे थे कि गहने कितने दिए तो आपको बुरा लग गया!

और तनिष्क की क्रिएटिव टीम वालों, धनतेरस पर चाँदी के सिक्कों का जो स्पेशल अलग काउंटर लगाते हो उसको अभी से समेटने की तैयारी रख लो! ये बस एक ऐड की बात नहीं| चरसियों का सारा चरस निकलेगा|

तैयार रहिये! हम नए-नए वामपंथी हुए हैं| हमने नया-नया बहिष्कार सीखा है| केवल छह वर्ष ही तो हुए हैं| हमसे ऐसी गलतियाँ हो सकती हैं| जब हम आपकी तरह पक जाएँगे फिर आप हमसे झापड़ों की बात कीजिएगा!

पहले ढंग से चोट मारने तो दीजिए! आपकी गाल लाल तो हो ढंग से! क्या जयचंद बाबू आप तो अभी से रोने लगे!!

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